नियुक्ति के नाम पर दलाली का रैकेट बेनकाब हो

सरकारी नौकरी के नाम पर ठगी और दलाली का खेल कोई नया नहीं है, लेकिन सरायकेला-खरसावां जिले के चौका में सामने आया ताजा मामला इस गोरखधंधे की गंभीरता को फिर उजागर करता है। यहां एक व्यक्ति पर सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर 10 लाख रुपये मांगने का आरोप लगा। स्थानीय लोगों ने उसे पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं, बल्कि सरकारी नियुक्तियों के नाम पर सक्रिय बड़े रैकेट की ओर इशारा करता है।
आज लाखों युवा वर्षों तक कठिन परिश्रम कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लिखित परीक्षा और अन्य चरणों में सफल होने के बाद भी जब नियुक्ति पत्र के नाम पर 10 से 15 लाख रुपये की मांग की जाती है, तो यह उनकी मेहनत और व्यवस्था—दोनों का अपमान है। सबसे अधिक पीड़ा उन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को होती है, जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए जीवनभर की जमा-पूंजी लगा देते हैं।
इस मामले में एक चाय विक्रेता की बेटी का उदाहरण बेहद मार्मिक है। उसने कठिन परिश्रम से सरकारी नौकरी पाने की दहलीज तक पहुंचने का सफर तय किया, लेकिन नियुक्ति के नाम पर उससे 10 लाख रुपये मांगे गए। जिन परिवारों के पास जमीन-जायदाद होती है, वे उसे बेचने तक को तैयार हो जाते हैं। कई लोग कर्ज लेकर रिश्वत देने का विचार करते हैं। यह स्थिति बताती है कि भ्रष्ट तत्व युवाओं की मजबूरी का किस तरह फायदा उठा रहे हैं।
झारखंड सरकार एक ओर रोजगार के अवसर बढ़ाने, नई नियुक्तियां निकालने और राज्य में निवेश आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री स्वयं निवेशकों को राज्य में लाने के लिए पहल कर रहे हैं और बड़े निवेश समझौतों की दिशा में काम हो रहा है। ऐसे समय में यदि नौकरी दिलाने के नाम पर दलाल सक्रिय रहते हैं, तो इससे केवल अभ्यर्थियों का ही नहीं, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता का भी नुकसान होता है।
इसलिए आवश्यक है कि चौका प्रकरण की निष्पक्ष, गहन और समयबद्ध जांच हो। आरोपी के पास मिले दस्तावेजों, उसके संपर्कों और पूरे नेटवर्क की जांच की जाए। यदि इसके पीछे कोई संगठित गिरोह काम कर रहा है, तो उसे पूरी तरह उजागर कर कानून के कठोर दायरे में लाया जाए। केवल एक गिरफ्तारी से समस्या समाप्त नहीं होगी; पूरे तंत्र का पर्दाफाश होना चाहिए।
सरकार को इस मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनानी चाहिए। दोषियों को ऐसी सख्त सजा मिले कि भविष्य में कोई भी सरकारी नौकरी के नाम पर युवाओं की उम्मीदों और मजबूरियों का सौदा करने का साहस न कर सके। सरकारी नियुक्तियों की पारदर्शिता बनाए रखना केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और जनता के विश्वास की रक्षा का भी प्रश्न है।

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